ग़म

आया था एक शख़्स मेरे ग़म बाँटने को
रूख़सत हुआ तो अपने ग़म भी दे गया मुझे




नया साल

मै अगर खत्म भी हो जाऊँ
इस साल की तरह
तुम मेरे बाद भी सँवरते रहना
नये साल की तरह

फासले

फासले तो बढ़ा रहे हो मगर इतना याद रखना ,
के मोहब्बत बार बार इंसान पर मेहरबान नहीं होती |